हिंदू धर्म में ईश्वर का स्वरूप: एक चौंकाने वाला सत्य
हिंदू धर्म में ईश्वर का जो स्वरूप प्रस्तुत किया गया है, वह अन्य धर्मों की अपेक्षा कहीं अधिक व्यापक, सूक्ष्म और गूढ़ है। जहाँ अन्य धर्मों में ईश्वर को एक न्यायकारी, सृष्टिकर्ता या किसी पुरुष रूप में देखा गया है, वहीं हिंदू धर्म में ईश्वर को निराकार, अजन्मा, असीम और निर्लिप्त बताया गया है। यह विचार वेद, उपनिषद, गीता और अन्य शास्त्रों में स्पष्ट रूप से प्रकट होता है।
ऋग्वेद (10.129) में कहा गया है:
"सृष्टि से पहले सत नहीं था, असत भी नहीं, आकाश नहीं था, अंतरिक्ष भी नहीं था। क्या था, किसने देखा? वही महान हिरण्यगर्भ ही सबका स्वामी था।"
यह श्लोक स्पष्ट करता है कि ईश्वर कोई प्रकट सत्ता नहीं, बल्कि अनिर्वचनीय चेतना है जो सृष्टि से पहले भी विद्यमान थी और सृष्टि के उपरांत भी रहती है।
एक ही ईश्वर है – अद्वितीय और सर्वव्यापक
छांदोग्य उपनिषद कहता है – "एकम् एव अद्वितीयम्", अर्थात ईश्वर केवल एक है, उसका कोई दूसरा नहीं।
यजुर्वेद कहता है – "नास्ति किंचन द्वितीय", दूसरा कोई नहीं है, बिल्कुल नहीं।
उसका कोई रूप नहीं, कोई मूर्ति नहीं
श्वेताश्वतर उपनिषद कहता है – "न तस्य प्रतिमा अस्ति", उसकी कोई प्रतिमा नहीं बनाई जा सकती।
वह शरीरहीन है, उसे आँखों से नहीं देखा जा सकता, केवल अनुभूति द्वारा जाना जा सकता है।
ईश्वर साकार नहीं, निराकार है
ईश्वर को किसी रूप, नाम या मूर्ति में सीमित नहीं किया जा सकता। वह कोई देवता, देवी, पुरुष या स्त्री नहीं है।
वह प्रकाश है, परंतु केवल दृश्य प्रकाश नहीं, अपरा चेतना का स्रोत है।
ईश्वर सृष्टिकर्ता नहीं, परंतु सृष्टि का आधार है
ईश्वर सृष्टि को संचालित नहीं करता, न ही सृष्टि का रचयिता है, परंतु उसकी उपस्थिति से ही सब कुछ अस्तित्व में है।
जिस तरह सूर्य के प्रकाश से जीवन संभव है, उसी तरह परमात्मा की चेतना से जगत गतिमान है।
ईश्वर न्याय नहीं करता
न वह किसी को सजा देता है, न इनाम। वह केवल है – निष्क्रिय होकर भी सब कुछ उसकी उपस्थिति से ही हो रहा है।
न स्वर्ग भेजता है, न नरक। मनुष्य स्वयं अपने कर्मों के अनुसार फल पाता है।
ईश्वर सर्वत्र है – निकट और दूर दोनों
वह पास से भी पास है, और दूर से भी दूर।
ईशावास्य उपनिषद कहता है – "तदेजति तन्नैजति, तद्दूरे तद्वन्तिके" अर्थात वह गति करता है, परंतु स्थिर भी है; वह दूर भी है और पास भी।
आत्मा ही ईश्वर की छाया है। 'अहं ब्रह्मास्मि' – मैं ही ब्रह्म हूं।
'तत्वमसि' – तू ही ब्रह्म है।
यह विचार अद्वैत वेदांत का मूल है, जो कहता है कि आत्मा और परमात्मा में कोई भिन्नता नहीं।
आत्मा को जानने वाला ही ईश्वर को जान सकता है। स्वयं को जानना ही ईश्वर को जानना है।
ईश्वर कोई देवता, ब्रह्मा, विष्णु या शिव नहीं है।
वह न राम है, न कृष्ण, न बुद्ध और न किसी काल का अवतार।
ईश्वर का कोई पुत्र नहीं है, न ही वह किसी का पिता है।
उसका कोई संदेशवाहक या एजेंट नहीं है।
ईश्वर की पूजा एकांत में करनी चाहिए।
ऋग्वेद कहता है – "मा चिदंयाद्वी शंसता", केवल उसी की उपासना करो।
प्राकृतिक वस्तुओं की पूजा करने वालों को अथर्ववेद में अंधकार में बताया गया है।
यह संकेत है कि केवल दृश्य जगत की पूजा ईश्वर की सच्ची उपासना नहीं है।
भगवद्गीता (10:3) कहती है – “जो मुझे अजन्मा और अनादि जानते हैं, वे ही सच्चे ज्ञानी हैं।”
वह सत्य, चित् और आनंद स्वरूप है।
वह अजन्मा, अनादि और अनंत है।
उसका न कोई रूप है, न आकार।
वह सदा परिपूर्ण, निर्विकार, और अचल है।
वही सबका आधार है, वही सबका अंत है।
हिंदू धर्म में ईश्वर का स्वरूप अत्यंत वैज्ञानिक, दार्शनिक और अनुभूतिपरक है। वह किसी विशेष रूप, नाम या व्यक्तित्व से बंधा नहीं है। वह न सृष्टिकर्ता है, न न्यायाधीश, न पुरुष, न स्त्री – वह मात्र 'है'। वह चेतना है, वह प्रकाश है, वह सत्य है।
जो स्वयं को जानता है, वह उसे जानता है। जो उससे एकत्व स्थापित करता है, वह सच्चे सुख और मुक्ति को प्राप्त करता है।
"सर्वं खल्विदं ब्रह्म" – यह सम्पूर्ण ब्रह्मांड ही ब्रह्म (ईश्वर) है।
"नेति नेति" – वह न यह है, न वह, वह उससे भी परे है।
यही सनातन धर्म का सत्य है।
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